शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

मैं बचपन ...


मेरा जाति या धर्म नहीं
मुझमें कोई भी अहम नहीं
मैं बचपन ...
धूल-मिट्टी पटे गलियारों में
या पेपो शोर मचाते पार्कों में
चहरे पर मुस्कान वही, आँखों में शैतान वही
मुझे शहर ,कस्बों और गावों की पहचान नहीं

मैं बचपन ...

दादा -दादी , नाना -नानी , चाचा -चाची , अंकल -आंटी
सभी मेरे खेल का हिस्सा , मुझे लुभाए सबका किस्सा
अपने - पराये की मुझे पहचान नहीं
 
मैं बचपन ...

क्या सोचे तू दूर खड़ा , आ मेरे पास बैठ जरा
तू भी तो गुजरा है इन्ही गलियों से
झूठ- फ़रेब , भलाई - बुराई , दौलत -शोहरत
से दूर जहा सिर्फ़ सच्चाई थी
तू वापसी का पथ तोड़ आया
सच्चाई पीछे कहीं छोड़ आया
अब मुझे पास बुलाता है , मैं भी एक दिन तुझसा हो जाऊँगा
पर ! क्या तू कभी मुझसा हो पाएगा ....?

मैं बचपन ...


सोनी  सिंह

 

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