शनिवार, 25 मई 2013

छोटा है पर चोखा है ...

मोबाइल , कैमरा हो या लैपटॉप ऑपरेट करते समय अगर मैं कहीं अटक जाऊं या कुछ पल को रुक जाऊं तो मेरी पांच साल की बच्ची फटाफट मेरी मदद को तत्पर हो जाती है। सच कहूँ तो फेसबुक पे लगी फोटो या ब्लॉग पर लिखे मैटर के बारे में मैं भी उसकी सलाह लेना  नहीं भूलती, यक़ीनन उसकी सलाह अच्छी ही होती है। नयी पीढ़ी की यह आत्मनिर्भरता आश्चर्यजनक लेकिन पॉजिटिव   है। अगर आपने कभी गौर नहीं किया तो आस-पास खेलते  5-6 साल के बच्चो पर ध्यान दें, आप भी मेरी बात से सहमत हो जाएंगे। जिस उम्र में हमें खिलौने को चलाने तक के लिए अपने बड़ो का मुंह ताकना पड़ता था उस उम्र में ये छोटे नन्हे-मुन्ने हम बड़ो के टेक्निकल गुत्थियों को आसानी से सुलझा लेते हैं।







टेक्नो किड्स :

अपने गेम्स हो या बड़ो के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बच्चे इस तरह घुल-मिल जाते हैं , जैसे पानी में शक्कर। ख़ास बात तो यह है कि मोबाइल चाहे किसी कंपनी का हो या स्पेशल फंक्शन , कुछ ही मिनटों की जांच-पड़ताल के बाद ही उसकी हर गुत्थी सुलझा लेते हैं। अभी कुछ साल पहले ही अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को लॉक कर आप उन्हें बच्चों से आसानी से  बचा लेते थे लेकिन  अब बच्चे समझा देते हैं कि  इसे कैसे अनलॉक करना हैं।

मेरी ड्रेस मेरी पसंद :

बड़े भले ही अपनी ड्रेस को  लेकर दूसरों की सलाह लेते हों, लेकिन बच्चे छानबीन कर अपनी ड्रेस, शूज -सैंडल, बेल्ट , हेयर बैंड खुद ही पसंद कर लेते हैं। बहुत हद तक  इसके पीछे मॉल कल्चर भी वजह है। मॉल में पहुंचे और आपका बच्चा किड्स कार्नर में पहुँच जाता है, बस फिर उसे आपकी की मदद की जरुरत नहीं पड़ती। जबकि हममे से शायद अक्सर बचपन में अपनी बड़ो की पसंद को ही अपने लिए उपयुक्त माना होगा। आज के बच्चो के पास इसका जवाब  भी है कि उन्हें यह  ड्रेस या कलर क्यूँ लेना चाहिए।

गिफ्ट्स से खिलौने तक नो उलझन:

अगर आप बच्चे को आप्शन दे दें कि एक महीने में उसे  एक खिलौना खरीदने की इजाजत है तो फाटक से वह 12 महीने के हिसाब से 12 खिलौनों की लिस्ट बनाकर आपको थमा  देगा। यदि आपने वह लिस्ट खो भी दी तो उसके कंप्यूटर दिमाग में यह फीड रहेगी। यहाँ तक कि बर्थडे पर मम्मी-पापा, मामा-चाचा, मासी-बुआ या फ्रेंड्स से क्या गिफ्ट लेना है ये लेकर भी वो कभी कंफ्यूज नहीं होते हैं।

प्रश्नों का बार हमेशा तैयार :

मन में  सवाल उठाना और उनके जवाब पूछना हमेशा से बच्चों  की फितरत रही है। हमने भी अपने बचपन में जाने कितने सवाल पूछ कर बड़ो को परेशान किया होगा, किन्तु आजकल के बच्चों के पास एक तो प्रश्नोंकी लिस्ट बहोत बड़ी होती है साथ ही उनके पास क्रॉस क्वेश्चन भी होते हैं, आपके एक उत्तर पर कम से कम पांच प्रश्न। मजेदार तो यह है कि उन्हें चाँद न तो मामा लगता है ना ही कोई खिलौना, उनका प्रश्न है कि चाँद पर जाना है तो क्या करें।

होमवर्क में नो चिक-चिक:
इन स्मार्ट किड्स के पीछे उनका होमवर्क करने के लिए नहीं दौड़ना पड़ता, बल्कि खुद बिना किसी चिक-चिक के होमवर्क पूरा कर खेलने को तैयार हो जाते हैं।

यह बदलाव पॉजिटिव तो है किन्तु थोड़ा ज्यादा केयर मांगता है। आस-पास इतनी अच्छी-बुरी चीजें आसानी से उपलब्ध हैं कि बच्चा भटक भी आसानी से सकता है। सब कुछ जल्दी से जल्दी समझने की ललक और एनर्जी से भरपूर इस पीढ़ी का भविष्य सुनहरा है आपको ज्यादा मेहनत करने की जगह बस अपना थोड़ा  सा समय और प्यार देकर इसे रचनात्मक दिशा में मोड़ भर देना है।

-soni singh-

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