मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

इतना गुस्सा क्यों है भाई!!!


Pic via : http://funkzip.com

जिंदगी की रेस में विनर बनने की चाहत में हम खुद तो दौड़ ही रहे हैं अपने साथ - साथ बच्चों को भी उनकी मर्जी के बिना हमने रेस में शामिल कर लिया है। इस अंधी दौड़ के कारण हम तो मानसिक दबाव से गुजर ही रहे हैं, बच्चों पर भी मानसिक दबाव डाल रहे हैं।

 छोटी-छोटी बात पर चीखना - चिल्लाना आज आम जिंदगी का डेली रूटीन हो गया है। बड़ो के बीच इस तरह की स्थिति तो हफ़्ते में चार दिन तो बन ही जाती है, लेकिन ऐसे में छोटे बच्चों का डर कर दुबक जाना अब बीते ज़माने की बात हो गयी है। बात अजीब मगर सच है कि अब बहुत छोटी उम्र के बच्चे भी बड़ो की तरह शॉर्ट-टेम्पर्ड हो रहे हैं।
अकेलापन
आधुनिक पीढ़ी दो की जगह एक ही बच्चा चाहती है। हर किसी की अपनी वजह है, ऐसे में बच्चा बिलकुल अकेला हो जाता है। स्कूल, कोचिंग में हम उम्र दोस्तों के साथ होते हुए भी उसे इतना वक़्त नहीं मिलता कि वह बात चीत कर सके। कुछ  घंटे अगर किसी तरह व्यस्त दिनचर्या से निकल भी आये तो बच्चे के पास तकनीकी ऐसा लुभावना संसार होता है कि वह बच्चों के साथ खेलने की बजाय लैपटॉप,  टैबुलेट, मोबाइल, कंप्यूटर, टी . वी . से चिपकना पसंद करता है। धीरे -धीरे वह अपने चारो तरफ अकेलेपन का एक दायरा बुन लेता है, जिसके अन्दर जब कोई बड़ा घुसने की कोशिश करता है तो बच्चे का गुस्सा फूट पड़ता है।
सेल्फ डिपेंडेंसी
पहले हम बच्चे को आत्म निर्भर बनाने के लिए उसे अपनी चीजे खुद पसंद करने की इजाजत देते हैं, फिर यह उसकी आदत बन जाती है। ऐसे में बहुत ही छोटी उम्र के बच्चे भी बड़ो को उनके निर्णय लेने नहीं देते। यदि हम उन्हें समझाने की कोशिश करते है तो वह चिल्लाकर विरोध जताते हैं।
बड़ो से मिली सीख

बच्चे बड़ो से  अच्छी सीख तो लेते ही हैं साथ ही उनकी बुरी आदते भी उनमें स्वत: ही आ जाती हैं। बच्चों के लिये अच्छे और बुरे के बीच का फर्क समझना मुश्किल होता है। वैसे भी आसपास मौजूद बड़ो में ही बच्चे अपना रोले मॉडल तलाशते हैं और ऐसे में उनके बड़े यदि बात - बात पर गुसा करते हैं तो बड़े बच्चे भी उन्हें कॉपी करने लगते है।

सिमटता दायरा

फ्लैट में रहने वाले लोगों  के बच्चे उनकी मर्जी की बिना ही आपसी तनाव के दर्शक बन जाते हैं। कई बार बड़ो के बीच होने वाली तीखी बात चीत को वह अपने मन में बिठा लेते हैं। समय - समय पर बच्चे गुस्से के रूप इसे  में जताते हैं। बात - बात पर "मुझे अभी दूध नहीं पीना, मुझे अकेले छोड़ दो ..." जैसी बातें उनके मन में दबे गुस्से का प्रतिरूप होतीं हैं।

बढ़ता दबाब

बच्चे को बेस्ट बनाने के चक्कर में कोई अभिभावक यह नहीं समझना चाहता कि  हर बच्चे कि एक निश्चित क्षमता होती है उससे से अधिक का दबाव डालने पर वह मानसिक तनाव से गुजरने लगता है। यह डिप्रेशन गुस्से और झुंझलाहट के रूप में बहार निकलता है।

अत्यधिक छोटे बच्चों में गुस्से की यह आदतें अच्छी नहीं हैं और जाने अनजाने बड़े ही इसके लिए जिम्मेदार नजर आते हैं। अच्छा हो कि बचपन में ही उनकी इस आदत की अनदेखी ना की जाए नहीं तो किशोरवय होने तक इस गुस्से को रोकना मुश्किल हो जाएगा।

- सोनी सिंह -

रविवार, 28 अप्रैल 2013

...और डर भाग गया

चिंकी  पहली कक्षा में पढ़ती थी। मोनू उसकी क्लास का सबसे शैतान बच्चा था। वह अकसर  चिंकी की चीजें छीन लिया करता था। वह बेचारी डर कर कभी उसका विरोध नहीं कर पाती थी। घर आकर चिंकी  अपनी 
मम्मी से इसकी शिकायत किया करती थी। माँ उसे समझाती कि चिंकी को मोनू से डरने की बजाए, उसकी गलत बातों का विरोध करना चाहिए। चिंकी अकसर 
सोचती कि वह आज मोनू को सबक सिखाएगी, किंतु उसके सामने पड़ते ही वह डरकर दुबक जाती थी। चिंकी सोचा करती कि मोनू बहुत ताकतवर है वह टीचर से भी नहीं डरता। इसलिए वह टीचर से भी मोनू की शिकायत नहीं किया करती थी।

एक दिन चिंकी के चाचा उससे मिलने आयें। उन्होंने चिंकी को एक सुंदर चांद - तारों वाला बॉक्स उपहार में दिया। दूसरे दिन चिंकी खुशी-खुशी नया पेंसिल बॉक्स लेकर स्कूल गयी और अपने दोस्तों को दिखने लगी। उसी समय मोनू की नजर चिंकी के पेंसिल बॉक्स पर पड़ी। उसने चिंकी को बुलाकर नया बॉक्स उसके हवाले कर देने को कहा। चिंकी झट अपना बॉक्स ले आई और उसने वह मोनू को दे दिया। मोनू बॉक्स उलट-पलट कर देखने लगा। अपना पसंदीदा बॉक्स जाते देख  चिंकी का मन बहुत उदास हो गया। उसे माँ की सीख याद आई " चिंकी डरना नहीं, डर से आंखें मिलाकर तेज से चिल्लाना डर भाग जाएगा।"

चिंकी ने वैसा ही किया जैसा माँ ने सिखाया था। चिंकी ने अपनी आंखें बंद की तेज से चिल्लाई - " चोर-चोर", उसी समय टीचर क्लास में आयीं। उन्होंने  चिंकी को चिल्लाते हुए सुना और उसके पास पहुंच गयीं। मारे डर के मोनू थर-थर कांपने लगा।
चिंकी की हंसी छूट गयी। वह जान गयी थी की मो  मोनू को भी डर  लगता है। टीचर ने मोनू को क्लास के बाहर कान पकड़ कर दिया  और चिंकी को उसका प्यारा बॉक्स वापस मिल गया। साथ ही उसे बड़ी सीख मिली और डर भाग गया।

- soni singh -

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

स्मार्ट जनरेशन!

एक कुत्ते को एक मिली। वह उसे मुहं  में दबाए एक पुल से गुजर रहा था तभी अपनी परछाई को देख कर वह भ्रम में पड़  गया कि पानी में दूसरा कुत्ता पानी में है। उसने सोचा क्यो ना उसकी भी रोटी हड़प ली जाए। इस चक्कर में उसने अपनी रोटी भी गंवा दी।


pic via : deviantart.com

यह कहानी तो सभी जानते हैं, लेकिन आगे की कहानी हमारे नए जनरेशन से जुड़ी है। 

पप्पू पिल्ले को एक रोटी का टुकड़ा मिला। उसने सोचा क्यों न इसे ऐसी जगह चल कर खाया जाए जहा आस - पास  कोई न हो। इस तरह मुझे अपनी रोटी अन्य पिल्लों के साथ बांटकर नहीं खानी पड़ेगी। उसे ख्याल आया इसके लिए छोटी पुलिया के पार की जगह ठीक रहेगी। खाने के बाद पानी भी पास ही मिल जाएगा, वही छांव में फिर आराम से सो जाऊँगा। यह सोच कर वह पुलिया पर  कुछ दूर ही चला था कि पानी में उसे अपनी परछाई नजर आयी। उसने सोचा किसी तरह दूसरे पिल्ले की मुंह की रोटी छीन ली जाए तो मजे से पेट भर खाऊँगा।

पप्पू पिल्ले ने दुबारा पानी में झांका , फिर अपनी ताकत को  आंका। वह पिल्ला भी पप्पू को अपनी तरह ही चुस्त-तंदुरुस्त ही दिखा। अब पप्पू पिल्ला चक्कर में पड़ गया कि कहीं उस पिल्ले से रोटी लेने गया और अपनी  रोटी गंवा  बैठा तो लेने के देने पड़  जायेंगे। पूरा पेट भरने के चक्कर में आधा पेट भी नहीं भर पाएगा। झट  पप्पू पिल्ले ने दूसरे पिल्ले से रोटी छीनने का ख्याल दिमाग से झटका और पुलिया के उसपार चल पड़ा। वहां  जाकर आराम से छांव में बैठ कर पप्पू दुम हिलाता हुआ अपनी रोटी खाने लगा। 

कहानी का सार:-

अगली पीढ़ी भले ही बुद्धिमान ना भी हो तो उसे इतनी समझ जरुर है कि आपसी लड़ाई के चक्कर में सबकुछ गंवाने से अच्छा है कि अपने  हिस्से  का पाकर मस्त रहो।


- सोनी सिंह -

मंगलवार, 23 अप्रैल 2013

फुल मस्ती @ छुट्टी.....

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे और पेरेंट्स दोनों परेशान हो जाते हैं कि इतनी लंबी छुट्टियों में कैसे करें फुल मस्ती? इसलिए आप दोनों मिलकर कुछ ऐसा प्लान करें कि छुट्टियओं  का  पूरा  एन्जॉयमेंट  तो हो  ही खेल- खेल में कुछ नया सीख  भी लें .पेरेंट्स  बच्चे पर कुछ थोपे नहीं बल्कि  उसकी मर्जी का भी पूरा खयाल रखे ताकि वह इसे एन्जॉय कर सके. 

फैमिली  ट्रिप पुराना फार्मूला :

आजकल एकल परिवार के बढ़ते चलन के कारन बच्चे सिर्फ छुट्टियों में ही अपने दादा-दादी , नाना -नानी , चाचा - चाची और अन्य रिश्तेदारों से मिल पाते हैं , ऐसे में पूरे  परिवार के साथ छुट्टियां बिताने का प्लान सबसे पुराना और मजेदार है . इतने लोगो के बीच लंबी छुट्टियां कैसे बीत जाती हैं कुछ पता ही नहीं चलता . आप भी अगर ऐसे अपना वेकेशन प्लान  कर रहें है , तो यह मजेदार आईडिया है, लेकिन मौज- मस्ती में बच्चे की पढ़ाई की ओर से पूरी तरह लापरवाह न हो .

पिक वाया : idiva.com

समर कैंप है बढ़िया  आईडिया :

अगर आप कहीं नहीं जा राहें  तो बच्चे को समर कैंप  में डालना भी बढ़िया आईडिया हैं . स्कूल , कोचिंग और होमवर्क के बीच फसे बच्चो के शौक को हमें अक्सर अनदेखा करना पड़ता है . वैसे भी सिर्फ किताबी कीड़ा होना पुरानी बात हो गई है आजकल  आलराउंडर होना चलन में हैं . ऐसे में समर कैंप के बहाने , बच्चे मस्ती -मस्ती में कुछ नया सीख लेते हैं . 1 5 दिन से लेकर एक महीने तक चलने वाले इन कैंपों में पेंटिंग , डांस ,सेल्फ - डिफेंस , जनरल नॉलेज बढ़ाने  से लेकर हैंडराइटिंग सुधारने तक के तरीके सिखाए जाते हैं . आज कल तो स्कूल की ओर  से भी ऐसे कैंप लगाए जाते हैं, जिनकी फी बहुत  कम होती है .

पर्सनल क्लासेज आजमाएं  :

यदि आप बच्चे को समर कैंप  में नहीं डालना चाहते तो उसके शौक  को ध्यान में रखते हुए किसी डांस, म्यूजिक, पेंटिंग , कराटे क्लास में दाल सकते हैं , इससे उसमे कुछ नया सीखने  की ललक तो जागेगी ही साथ अपने हम उम्र के साथ दोस्ती करना भी सीख जाएगा , यकीन मानिए क्लास से लौट कर जब वह अपने प्रैक्टिस की कहानियां सुनाएगा तो आपको भी मजा आएगा .

समय निकाले बनाए  प्लान :

यदि पेरेंट्स वर्किंग हो तो बच्चे के लिए समय नहीं निकल पातें हैं . माँ  अगर हाउस वाइफ हो तो भी अन्य जिम्मेदारियों को निभाने में बच्चे को अनदेखा  कर देती हैं . छुट्टियों में बछो के साथ बात-चीत करें , खेलें  यानी उनकी दुनिया का हिस्सा बन जाएं . वीकेंड  पर पिकनिक, सैर- सपाटा का प्लान बनायें  ताकि बच्चे खुद को ख़ास महसूस करें .

थोड़ा सा ध्यान देने की जरुरत है फिर बच्चे और पेरेंट्स दोनों ही छुट्टियों को पूरा एन्जॉय करेंगे . आपकी लापरवाही से ऐसा न हो कि वेकेशन के बहाने बच्चा  दिन रात  टीवी , कंप्यूटर , वीडियो गेम से चिपका रहे और वेकेशन के बाद मोटा और भोंदू हो जाए ., ऐसा होने से पहले ही चलिए करें कुछ बढ़िया प्लान ...

-सोनी सिंह -


शनिवार, 20 अप्रैल 2013

बूंद - बूंद में जीवन ...

पानी में मस्ती करना बच्चों का फेवरेट गेम होता है , ख़ासतौर पर गर्मी में तो यह खेल घंटों  खेला जा सकता है.
इतना ही नहीं ब्रश करने से लेकर नहाने तक आप जाने कितने लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं , लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपकी इस मस्ती भरे खेल से कितने पानी का नुकसान  होता है ?

जीने  के लिए पानी पर निर्भरता सिर्फ मनुष्य के लिए ही नहीं, बल्कि  हर प्राणी के लिए महत्वपूर्ण है . मानव शारीर का 7 2 % पानी है . इसलिए अपनी शारीरिक आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए प्रतिदिन 4  लीटर पानी की आवशयकता होती है , क्योंकि  पानी शारीर के तापमान को नियंत्रित करता है . यह पोषक तत्वों और ऑक्सीजन को कोशिकाओ तक लाता ले जाता है .

पानी के सीमित  साधन :

कई बार ऐसा लगता है कि पृथ्वी पर  बहुत पानी है वैसे यह सच भी है . पृथ्वी का 7 5 %  भाग पानी से ढका  है , लेकिन इसमें से 9 7 % पानी समुंद्र का है शेष 2 %, ग्लेशियर्स और बर्फ़ के रूप में होता है . सिर्फ 1 % बचा  जिसे हम यूज़ कर सकते हैं .

गर्मी में बढ़ जाती है दिक्कत :

गर्मी के शुरू होते ही पानी की दिक्कतें  और बढ़ जाती हैं . कुछ लोगों  को तो पीने  का पानी तक नहीं मिल पाता इसके विपरीत कुछ लोग पानी की बर्बादी अपना हक समझते है , इसलिए अगर आपके पास है तो इसे बर्बाद करने से पहले अगली बार जरुर सोचिए कि  आपका बचाया एक एक बूंद पानी किसी तक एक बाल्टी पानी पंहुचा सकता है .


जल से है जीवन की हलचल ....
इसे बचाएं तभी रहेगा कल .....

- सोनी सिंह -

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

मैं बचपन ...


मेरा जाति या धर्म नहीं
मुझमें कोई भी अहम नहीं
मैं बचपन ...
धूल-मिट्टी पटे गलियारों में
या पेपो शोर मचाते पार्कों में
चहरे पर मुस्कान वही, आँखों में शैतान वही
मुझे शहर ,कस्बों और गावों की पहचान नहीं

मैं बचपन ...

दादा -दादी , नाना -नानी , चाचा -चाची , अंकल -आंटी
सभी मेरे खेल का हिस्सा , मुझे लुभाए सबका किस्सा
अपने - पराये की मुझे पहचान नहीं
 
मैं बचपन ...

क्या सोचे तू दूर खड़ा , आ मेरे पास बैठ जरा
तू भी तो गुजरा है इन्ही गलियों से
झूठ- फ़रेब , भलाई - बुराई , दौलत -शोहरत
से दूर जहा सिर्फ़ सच्चाई थी
तू वापसी का पथ तोड़ आया
सच्चाई पीछे कहीं छोड़ आया
अब मुझे पास बुलाता है , मैं भी एक दिन तुझसा हो जाऊँगा
पर ! क्या तू कभी मुझसा हो पाएगा ....?

मैं बचपन ...


सोनी  सिंह