डरावनी फिल्मों और किताबों से अपने बच्चों को हम अक्सर दूर ही रखते हैं, पर मनोविज्ञान के चश्मे से देखें तो थोड़ा सा डर बच्चों के लिए अच्छा है. डर की वजह से हमारे दिमाग में जो केमिकल उत्पन्न होता है, वह हमें खुश रखता है. इस कारण कई बार मानसिक तनाव की स्थिति में डर से हमें मानसिक सुकून मिलता है. आपने गौर किया होगा कि डरावनी फिल्में देखने में या भूतिया किस्से सुनने में खासी दिलचस्पी लेते हैं, जिससे शरीर से oxytocin नामक केमिकल निकलता है.यह केमिकल एक- दूसरे से दोस्ती बढ़ाने में मददगार साबित होता है.सच ही तो है, मूड अच्छा रहेगा तो स्वास्थ्य अच्छा ही रहना है. हालांकि, मनोवैज्ञानिक ने यह भी माना कि कुछ बच्चों के दिमाग पर डर का विपरीत असर होता है, मगर 6 साल से ज्यादा उम्र के ज्यादातर बच्चों के लिए डर अच्छा है. इससे वे टेंशन के बीच थोड़ा सा रिचार्ज हो जाते हैं और माहौल हल्का- फुल्का हो जाता है.
Kids रेल
Found useful information regarding better mental as well as physical development of your child.
रविवार, 31 जुलाई 2016
बुधवार, 29 मई 2013
...झूठा ही सही
झूठ बोलना एक ऐसी आदत है, जो बच्चों में अपने-आप विकसित हो जाती है।अकसर माता -पिता इसे लेकर परेशान भी रहते हैं कि यह आदत कैसे सुधारी जाए। पर यदि आपका बच्चा ज्यादा झूठ नहीं बोलता तो उसकी यह आदत आपकी ख़ुशी की वजह होनी चाहिए।
टोरंटो विश्वविद्यालय की ओर से किए गए एक सर्वे में यह बात सामने आई कि यदि आपका बच्चा 2 साल की उम्र में झूठ बोलता है तो यह उसके तेज दिमाग की निशानी है। स्टडी के अनुसार बच्चा जितनी सफाई से झूठ बोलता है वह बड़ा होकर उतना ही सफल व्यक्ति बनता है। यानी बच्चे का झूठ यह बताता है कि
उसका दिमाग कितना विकसित है और अपनी गलतियों को छुपाने के लिए वह कितनी
बेहतर कहानी गढ़ सकता है। 2 से 1 2 साल के बच्चों पर की गई इस स्टडी में यह बात सामने आई कि 3 साल के 4 0, 4 साल के 9 0 और 1 6 साल के 1 0 0 प्रतिशत बच्चे झूठ बोलते हैं।
हम सभी जन्म से ही झूठ बोलने कि कला में पारंगत होते हैं। हालांकि बहुत छोटे बच्चे झूठ बोलने में माहिर नहीं होते, लेकिन चार साल कि उम्र में जब उनकी कल्पनाशक्ति डेवलप हो रही होती है तो ऐसे में वह सीख जाते हैं कि सफाई से कैसे झूठ बोला जाए।
हम सभी जन्म से ही झूठ बोलने कि कला में पारंगत होते हैं। हालांकि बहुत छोटे बच्चे झूठ बोलने में माहिर नहीं होते, लेकिन चार साल कि उम्र में जब उनकी कल्पनाशक्ति डेवलप हो रही होती है तो ऐसे में वह सीख जाते हैं कि सफाई से कैसे झूठ बोला जाए।
मनोविज्ञानी सीमा बताती हैं कि झूठ बोलने के पीछे बच्चों की कुछ कॉमन वजह होती है जैसे-
अभिभावक क्या करें-
सबसे पहले तो बच्चें को झूठ बोलने के लिए सजा न दें। उससे झूठ बोलने की वजह बारे प्यार और धैर्य से सुनें, उसे प्यार से ही समझाने का प्रयास करें।
सच बोलने के लिए बच्चे को प्रोत्साहित करें। सच बोलने पर इनाम दें।
बच्चे को समझाएं कि अपने बड़ों और दोस्तों का विश्वास जीतने के लिए सच जरूरी है।
शुरू में ही बच्चे की झूठ बोलने की आदत को नजरअंदाज करने की बजाए उसकी परेशानी को समझने की कोशिश करें, कई बार बच्चे बड़ों का आकर्षन पाने के लिए झूठ बोलते हैं।
अपने भी सच बोलें, क्योंकि बच्चा जाने-अनजाने आपको ही कॉपी करता है।
बच्चे के झूठ बोलने की आदत के बारे में सबके सामने चर्चा कर उसे नीचा न दिखाएं, ना ही उसे झूठा नाम दें।
यानी आपको बहुत धैर्य से इस मसले में काम लेना है और बच्चे पर नाराज़ होने की बजाए उसकी आदत को अपने प्यार और विश्वास से बदलना है।
-सोनी सिंह शनिवार, 25 मई 2013
छोटा है पर चोखा है ...
मोबाइल
, कैमरा हो या लैपटॉप ऑपरेट करते समय अगर मैं कहीं अटक जाऊं या कुछ पल को
रुक जाऊं तो मेरी पांच साल की बच्ची फटाफट मेरी मदद को तत्पर हो जाती है।
सच कहूँ तो फेसबुक पे लगी फोटो या ब्लॉग पर लिखे मैटर के बारे में मैं भी
उसकी सलाह लेना नहीं भूलती, यक़ीनन उसकी सलाह अच्छी ही होती है। नयी पीढ़ी
की यह आत्मनिर्भरता आश्चर्यजनक लेकिन पॉजिटिव है। अगर आपने कभी गौर नहीं
किया तो आस-पास खेलते 5-6 साल के बच्चो पर ध्यान दें, आप भी मेरी बात से
सहमत हो जाएंगे। जिस उम्र में हमें खिलौने को चलाने तक के लिए अपने बड़ो का
मुंह ताकना पड़ता था उस उम्र में ये छोटे नन्हे-मुन्ने हम बड़ो के टेक्निकल
गुत्थियों को आसानी से सुलझा लेते हैं।

टेक्नो किड्स :
अपने गेम्स हो या बड़ो के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बच्चे इस तरह घुल-मिल जाते हैं , जैसे पानी में शक्कर। ख़ास बात तो यह है कि मोबाइल चाहे किसी कंपनी का हो या स्पेशल फंक्शन , कुछ ही मिनटों की जांच-पड़ताल के बाद ही उसकी हर गुत्थी सुलझा लेते हैं। अभी कुछ साल पहले ही अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को लॉक कर आप उन्हें बच्चों से आसानी से बचा लेते थे लेकिन अब बच्चे समझा देते हैं कि इसे कैसे अनलॉक करना हैं।
मेरी ड्रेस मेरी पसंद :
बड़े
भले ही अपनी ड्रेस को लेकर दूसरों की सलाह लेते हों, लेकिन बच्चे छानबीन
कर अपनी ड्रेस, शूज -सैंडल, बेल्ट , हेयर बैंड खुद ही पसंद कर लेते हैं।
बहुत हद तक इसके पीछे मॉल कल्चर भी वजह है। मॉल में पहुंचे और आपका बच्चा
किड्स कार्नर में पहुँच जाता है, बस फिर उसे आपकी की मदद की जरुरत नहीं
पड़ती। जबकि हममे से शायद अक्सर बचपन में अपनी बड़ो की पसंद को ही अपने लिए
उपयुक्त माना होगा। आज के बच्चो के पास इसका जवाब भी है कि उन्हें यह
ड्रेस या कलर क्यूँ लेना चाहिए।
गिफ्ट्स से खिलौने तक नो उलझन:
अगर आप बच्चे को आप्शन दे दें कि एक महीने में उसे एक खिलौना खरीदने की इजाजत है तो फाटक से वह 12 महीने के हिसाब से 12 खिलौनों की लिस्ट बनाकर आपको थमा देगा। यदि आपने वह लिस्ट खो भी दी तो उसके कंप्यूटर दिमाग में यह फीड रहेगी। यहाँ तक कि बर्थडे पर मम्मी-पापा, मामा-चाचा, मासी-बुआ या फ्रेंड्स से क्या गिफ्ट लेना है ये लेकर भी वो कभी कंफ्यूज नहीं होते हैं।
प्रश्नों का बार हमेशा तैयार :
मन में सवाल उठाना और उनके जवाब पूछना हमेशा से बच्चों की फितरत रही है। हमने भी अपने बचपन में जाने कितने सवाल पूछ कर बड़ो को परेशान किया होगा, किन्तु आजकल के बच्चों के पास एक तो प्रश्नोंकी लिस्ट बहोत बड़ी होती है साथ ही उनके पास क्रॉस क्वेश्चन भी होते हैं, आपके एक उत्तर पर कम से कम पांच प्रश्न। मजेदार तो यह है कि उन्हें चाँद न तो मामा लगता है ना ही कोई खिलौना, उनका प्रश्न है कि चाँद पर जाना है तो क्या करें।
यह बदलाव पॉजिटिव तो है किन्तु थोड़ा ज्यादा केयर मांगता है। आस-पास इतनी अच्छी-बुरी चीजें आसानी से उपलब्ध हैं कि बच्चा भटक भी आसानी से सकता है। सब कुछ जल्दी से जल्दी समझने की ललक और एनर्जी से भरपूर इस पीढ़ी का भविष्य सुनहरा है आपको ज्यादा मेहनत करने की जगह बस अपना थोड़ा सा समय और प्यार देकर इसे रचनात्मक दिशा में मोड़ भर देना है।
-soni singh-

टेक्नो किड्स :
अपने गेम्स हो या बड़ो के इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स बच्चे इस तरह घुल-मिल जाते हैं , जैसे पानी में शक्कर। ख़ास बात तो यह है कि मोबाइल चाहे किसी कंपनी का हो या स्पेशल फंक्शन , कुछ ही मिनटों की जांच-पड़ताल के बाद ही उसकी हर गुत्थी सुलझा लेते हैं। अभी कुछ साल पहले ही अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को लॉक कर आप उन्हें बच्चों से आसानी से बचा लेते थे लेकिन अब बच्चे समझा देते हैं कि इसे कैसे अनलॉक करना हैं।
मेरी ड्रेस मेरी पसंद :
गिफ्ट्स से खिलौने तक नो उलझन:
अगर आप बच्चे को आप्शन दे दें कि एक महीने में उसे एक खिलौना खरीदने की इजाजत है तो फाटक से वह 12 महीने के हिसाब से 12 खिलौनों की लिस्ट बनाकर आपको थमा देगा। यदि आपने वह लिस्ट खो भी दी तो उसके कंप्यूटर दिमाग में यह फीड रहेगी। यहाँ तक कि बर्थडे पर मम्मी-पापा, मामा-चाचा, मासी-बुआ या फ्रेंड्स से क्या गिफ्ट लेना है ये लेकर भी वो कभी कंफ्यूज नहीं होते हैं।
प्रश्नों का बार हमेशा तैयार :
मन में सवाल उठाना और उनके जवाब पूछना हमेशा से बच्चों की फितरत रही है। हमने भी अपने बचपन में जाने कितने सवाल पूछ कर बड़ो को परेशान किया होगा, किन्तु आजकल के बच्चों के पास एक तो प्रश्नोंकी लिस्ट बहोत बड़ी होती है साथ ही उनके पास क्रॉस क्वेश्चन भी होते हैं, आपके एक उत्तर पर कम से कम पांच प्रश्न। मजेदार तो यह है कि उन्हें चाँद न तो मामा लगता है ना ही कोई खिलौना, उनका प्रश्न है कि चाँद पर जाना है तो क्या करें।
होमवर्क में नो चिक-चिक:
इन स्मार्ट किड्स के पीछे उनका होमवर्क करने के लिए नहीं दौड़ना पड़ता, बल्कि खुद बिना किसी चिक-चिक के होमवर्क पूरा कर खेलने को तैयार हो जाते हैं।
यह बदलाव पॉजिटिव तो है किन्तु थोड़ा ज्यादा केयर मांगता है। आस-पास इतनी अच्छी-बुरी चीजें आसानी से उपलब्ध हैं कि बच्चा भटक भी आसानी से सकता है। सब कुछ जल्दी से जल्दी समझने की ललक और एनर्जी से भरपूर इस पीढ़ी का भविष्य सुनहरा है आपको ज्यादा मेहनत करने की जगह बस अपना थोड़ा सा समय और प्यार देकर इसे रचनात्मक दिशा में मोड़ भर देना है।
-soni singh-
मंगलवार, 30 अप्रैल 2013
इतना गुस्सा क्यों है भाई!!!
Pic via : http://funkzip.com
जिंदगी
की रेस में विनर बनने की चाहत में हम खुद तो दौड़ ही रहे हैं अपने साथ -
साथ बच्चों को भी उनकी मर्जी के बिना हमने रेस में शामिल कर लिया है। इस अंधी दौड़ के कारण हम तो मानसिक दबाव से गुजर ही रहे हैं, बच्चों पर भी मानसिक दबाव डाल रहे हैं।
छोटी-छोटी बात पर चीखना - चिल्लाना आज आम जिंदगी का डेली रूटीन हो गया है। बड़ो के बीच इस तरह की स्थिति तो हफ़्ते में चार दिन तो बन ही जाती है, लेकिन ऐसे में छोटे बच्चों का डर कर दुबक जाना अब बीते ज़माने की बात हो गयी है। बात अजीब मगर सच है कि अब बहुत छोटी उम्र के बच्चे भी बड़ो की तरह शॉर्ट-टेम्पर्ड हो रहे हैं।
छोटी-छोटी बात पर चीखना - चिल्लाना आज आम जिंदगी का डेली रूटीन हो गया है। बड़ो के बीच इस तरह की स्थिति तो हफ़्ते में चार दिन तो बन ही जाती है, लेकिन ऐसे में छोटे बच्चों का डर कर दुबक जाना अब बीते ज़माने की बात हो गयी है। बात अजीब मगर सच है कि अब बहुत छोटी उम्र के बच्चे भी बड़ो की तरह शॉर्ट-टेम्पर्ड हो रहे हैं।
अकेलापन
आधुनिक
पीढ़ी दो की जगह एक ही बच्चा चाहती है। हर किसी की अपनी वजह है, ऐसे में
बच्चा बिलकुल अकेला हो जाता है। स्कूल, कोचिंग में हम उम्र दोस्तों के साथ
होते हुए भी उसे इतना वक़्त नहीं मिलता कि वह बात चीत कर सके। कुछ घंटे अगर
किसी तरह व्यस्त दिनचर्या से निकल भी आये तो बच्चे के पास तकनीकी ऐसा
लुभावना संसार होता है कि वह बच्चों के साथ खेलने की बजाय लैपटॉप, टैबुलेट, मोबाइल, कंप्यूटर, टी . वी . से चिपकना पसंद करता है। धीरे -धीरे वह अपने चारो तरफ अकेलेपन का एक दायरा बुन लेता है, जिसके अन्दर जब कोई बड़ा घुसने की कोशिश करता है तो बच्चे का गुस्सा फूट पड़ता है।
सेल्फ डिपेंडेंसी
पहले
हम बच्चे को आत्म निर्भर बनाने के लिए उसे अपनी चीजे खुद पसंद करने की
इजाजत देते हैं, फिर यह उसकी आदत बन जाती है। ऐसे में बहुत ही छोटी उम्र के
बच्चे भी बड़ो को उनके निर्णय लेने नहीं देते। यदि हम उन्हें समझाने की
कोशिश करते है तो वह चिल्लाकर विरोध जताते हैं।
बड़ो से मिली सीख
बच्चे बड़ो से अच्छी सीख तो लेते ही हैं साथ ही उनकी बुरी आदते भी उनमें स्वत: ही आ जाती हैं। बच्चों के लिये अच्छे और बुरे के बीच का फर्क समझना मुश्किल होता है। वैसे भी आसपास मौजूद बड़ो में ही बच्चे अपना रोले मॉडल तलाशते हैं और ऐसे में उनके बड़े यदि बात - बात पर गुसा करते हैं तो बड़े बच्चे भी उन्हें कॉपी करने लगते है।
सिमटता दायरा
फ्लैट में रहने वाले लोगों के बच्चे उनकी मर्जी की बिना ही आपसी तनाव के दर्शक बन जाते हैं। कई बार बड़ो के बीच होने वाली तीखी बात चीत को वह अपने मन में बिठा लेते हैं। समय - समय पर बच्चे गुस्से के रूप इसे में जताते हैं। बात - बात पर "मुझे अभी दूध नहीं पीना, मुझे अकेले छोड़ दो ..." जैसी बातें उनके मन में दबे गुस्से का प्रतिरूप होतीं हैं।
बढ़ता दबाब
बच्चे को बेस्ट बनाने के चक्कर में कोई अभिभावक यह नहीं समझना चाहता कि हर बच्चे कि एक निश्चित क्षमता होती है उससे से अधिक का दबाव डालने पर वह मानसिक तनाव से गुजरने लगता है। यह डिप्रेशन गुस्से और झुंझलाहट के रूप में बहार निकलता है।
अत्यधिक छोटे बच्चों में गुस्से की यह आदतें अच्छी नहीं हैं और जाने अनजाने बड़े ही इसके लिए जिम्मेदार नजर आते हैं। अच्छा हो कि बचपन में ही उनकी इस आदत की अनदेखी ना की जाए नहीं तो किशोरवय होने तक इस गुस्से को रोकना मुश्किल हो जाएगा।
- सोनी सिंह -
बच्चे बड़ो से अच्छी सीख तो लेते ही हैं साथ ही उनकी बुरी आदते भी उनमें स्वत: ही आ जाती हैं। बच्चों के लिये अच्छे और बुरे के बीच का फर्क समझना मुश्किल होता है। वैसे भी आसपास मौजूद बड़ो में ही बच्चे अपना रोले मॉडल तलाशते हैं और ऐसे में उनके बड़े यदि बात - बात पर गुसा करते हैं तो बड़े बच्चे भी उन्हें कॉपी करने लगते है।
सिमटता दायरा
फ्लैट में रहने वाले लोगों के बच्चे उनकी मर्जी की बिना ही आपसी तनाव के दर्शक बन जाते हैं। कई बार बड़ो के बीच होने वाली तीखी बात चीत को वह अपने मन में बिठा लेते हैं। समय - समय पर बच्चे गुस्से के रूप इसे में जताते हैं। बात - बात पर "मुझे अभी दूध नहीं पीना, मुझे अकेले छोड़ दो ..." जैसी बातें उनके मन में दबे गुस्से का प्रतिरूप होतीं हैं।
बढ़ता दबाब
बच्चे को बेस्ट बनाने के चक्कर में कोई अभिभावक यह नहीं समझना चाहता कि हर बच्चे कि एक निश्चित क्षमता होती है उससे से अधिक का दबाव डालने पर वह मानसिक तनाव से गुजरने लगता है। यह डिप्रेशन गुस्से और झुंझलाहट के रूप में बहार निकलता है।
अत्यधिक छोटे बच्चों में गुस्से की यह आदतें अच्छी नहीं हैं और जाने अनजाने बड़े ही इसके लिए जिम्मेदार नजर आते हैं। अच्छा हो कि बचपन में ही उनकी इस आदत की अनदेखी ना की जाए नहीं तो किशोरवय होने तक इस गुस्से को रोकना मुश्किल हो जाएगा।
- सोनी सिंह -
रविवार, 28 अप्रैल 2013
...और डर भाग गया
चिंकी पहली कक्षा में पढ़ती थी। मोनू उसकी क्लास का सबसे शैतान बच्चा था।
वह अकसर चिंकी की चीजें छीन लिया करता था। वह बेचारी डर कर कभी उसका विरोध
नहीं कर पाती थी। घर आकर चिंकी अपनी
मम्मी से इसकी शिकायत किया करती थी।
माँ उसे समझाती कि चिंकी को मोनू से डरने की बजाए, उसकी गलत बातों का विरोध
करना चाहिए। चिंकी अकसर
सोचती कि वह आज मोनू को सबक सिखाएगी, किंतु उसके
सामने पड़ते ही वह डरकर दुबक जाती थी। चिंकी सोचा करती कि मोनू बहुत ताकतवर
है वह टीचर से भी नहीं डरता। इसलिए वह टीचर से भी मोनू की शिकायत नहीं किया
करती थी।
एक दिन चिंकी के चाचा उससे मिलने आयें। उन्होंने चिंकी को एक सुंदर चांद - तारों वाला बॉक्स उपहार में दिया। दूसरे दिन चिंकी खुशी-खुशी नया पेंसिल बॉक्स लेकर स्कूल गयी और अपने दोस्तों को दिखने लगी। उसी समय मोनू की नजर चिंकी के पेंसिल बॉक्स पर पड़ी। उसने चिंकी को बुलाकर नया बॉक्स उसके हवाले कर देने को कहा। चिंकी झट अपना बॉक्स ले आई और उसने वह मोनू को दे दिया। मोनू बॉक्स उलट-पलट कर देखने लगा। अपना पसंदीदा बॉक्स जाते देख चिंकी का मन बहुत उदास हो गया। उसे माँ की सीख याद आई " चिंकी डरना नहीं, डर से आंखें मिलाकर तेज से चिल्लाना डर भाग जाएगा।"
चिंकी ने वैसा ही किया जैसा माँ ने सिखाया था। चिंकी ने अपनी आंखें बंद की तेज से चिल्लाई - " चोर-चोर", उसी समय टीचर क्लास में आयीं। उन्होंने चिंकी को चिल्लाते हुए सुना और उसके पास पहुंच गयीं। मारे डर के मोनू थर-थर कांपने लगा।
चिंकी की हंसी छूट गयी। वह जान गयी थी की मो मोनू को भी डर लगता है। टीचर ने मोनू को क्लास के बाहर कान पकड़ कर दिया और चिंकी को उसका प्यारा बॉक्स वापस मिल गया। साथ ही उसे बड़ी सीख मिली और डर भाग गया।
- soni singh -
एक दिन चिंकी के चाचा उससे मिलने आयें। उन्होंने चिंकी को एक सुंदर चांद - तारों वाला बॉक्स उपहार में दिया। दूसरे दिन चिंकी खुशी-खुशी नया पेंसिल बॉक्स लेकर स्कूल गयी और अपने दोस्तों को दिखने लगी। उसी समय मोनू की नजर चिंकी के पेंसिल बॉक्स पर पड़ी। उसने चिंकी को बुलाकर नया बॉक्स उसके हवाले कर देने को कहा। चिंकी झट अपना बॉक्स ले आई और उसने वह मोनू को दे दिया। मोनू बॉक्स उलट-पलट कर देखने लगा। अपना पसंदीदा बॉक्स जाते देख चिंकी का मन बहुत उदास हो गया। उसे माँ की सीख याद आई " चिंकी डरना नहीं, डर से आंखें मिलाकर तेज से चिल्लाना डर भाग जाएगा।"
चिंकी ने वैसा ही किया जैसा माँ ने सिखाया था। चिंकी ने अपनी आंखें बंद की तेज से चिल्लाई - " चोर-चोर", उसी समय टीचर क्लास में आयीं। उन्होंने चिंकी को चिल्लाते हुए सुना और उसके पास पहुंच गयीं। मारे डर के मोनू थर-थर कांपने लगा।
चिंकी की हंसी छूट गयी। वह जान गयी थी की मो मोनू को भी डर लगता है। टीचर ने मोनू को क्लास के बाहर कान पकड़ कर दिया और चिंकी को उसका प्यारा बॉक्स वापस मिल गया। साथ ही उसे बड़ी सीख मिली और डर भाग गया।
- soni singh -
शनिवार, 27 अप्रैल 2013
स्मार्ट जनरेशन!
एक कुत्ते को एक मिली। वह उसे मुहं में दबाए एक पुल से गुजर रहा था तभी अपनी परछाई को देख कर वह भ्रम में पड़ गया कि पानी में दूसरा कुत्ता पानी में है। उसने सोचा क्यो ना उसकी भी रोटी हड़प ली जाए। इस चक्कर में उसने अपनी रोटी भी गंवा दी।
pic via : deviantart.com
यह कहानी तो सभी जानते हैं, लेकिन आगे की कहानी हमारे नए जनरेशन से जुड़ी है।
पप्पू पिल्ले को एक रोटी का टुकड़ा मिला। उसने सोचा क्यों न इसे ऐसी जगह चल कर खाया जाए जहा आस - पास कोई न हो। इस तरह मुझे अपनी रोटी अन्य पिल्लों के साथ बांटकर नहीं खानी पड़ेगी। उसे ख्याल आया इसके लिए छोटी पुलिया के पार की जगह ठीक रहेगी। खाने के बाद पानी भी पास ही मिल जाएगा, वही छांव में फिर आराम से सो जाऊँगा। यह सोच कर वह पुलिया पर कुछ दूर ही चला था कि पानी में उसे अपनी परछाई नजर आयी। उसने सोचा किसी तरह दूसरे पिल्ले की मुंह की रोटी छीन ली जाए तो मजे से पेट भर खाऊँगा।
पप्पू पिल्ले ने दुबारा पानी में झांका , फिर अपनी ताकत को आंका। वह पिल्ला भी पप्पू को अपनी तरह ही चुस्त-तंदुरुस्त ही दिखा। अब पप्पू पिल्ला चक्कर में पड़ गया कि कहीं उस पिल्ले से रोटी लेने गया और अपनी रोटी गंवा बैठा तो लेने के देने पड़ जायेंगे। पूरा पेट भरने के चक्कर में आधा पेट भी नहीं भर पाएगा। झट पप्पू पिल्ले ने दूसरे पिल्ले से रोटी छीनने का ख्याल दिमाग से झटका और पुलिया के उसपार चल पड़ा। वहां जाकर आराम से छांव में बैठ कर पप्पू दुम हिलाता हुआ अपनी रोटी खाने लगा।
कहानी का सार:-
अगली पीढ़ी भले ही बुद्धिमान ना भी हो तो उसे इतनी समझ जरुर है कि आपसी लड़ाई के चक्कर में सबकुछ गंवाने से अच्छा है कि अपने हिस्से का पाकर मस्त रहो।
- सोनी सिंह -
मंगलवार, 23 अप्रैल 2013
फुल मस्ती @ छुट्टी.....
गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चे और पेरेंट्स दोनों परेशान हो जाते हैं कि इतनी लंबी छुट्टियों में कैसे करें फुल मस्ती? इसलिए आप दोनों मिलकर कुछ ऐसा प्लान करें कि छुट्टियओं का पूरा एन्जॉयमेंट तो हो ही खेल- खेल में कुछ नया सीख भी लें .पेरेंट्स बच्चे पर कुछ थोपे नहीं बल्कि उसकी मर्जी का भी पूरा खयाल रखे ताकि वह इसे एन्जॉय कर सके.
फैमिली ट्रिप पुराना फार्मूला :
आजकल एकल परिवार के बढ़ते चलन के कारन बच्चे सिर्फ छुट्टियों में ही अपने दादा-दादी , नाना -नानी , चाचा - चाची और अन्य रिश्तेदारों से मिल पाते हैं , ऐसे में पूरे परिवार के साथ छुट्टियां बिताने का प्लान सबसे पुराना और मजेदार है . इतने लोगो के बीच लंबी छुट्टियां कैसे बीत जाती हैं कुछ पता ही नहीं चलता . आप भी अगर ऐसे अपना वेकेशन प्लान कर रहें है , तो यह मजेदार आईडिया है, लेकिन मौज- मस्ती में बच्चे की पढ़ाई की ओर से पूरी तरह लापरवाह न हो .
पिक वाया : idiva.com
समर कैंप है बढ़िया आईडिया :
अगर आप कहीं नहीं जा राहें तो बच्चे को समर कैंप में डालना भी बढ़िया आईडिया हैं . स्कूल , कोचिंग और होमवर्क के बीच फसे बच्चो के शौक को हमें अक्सर अनदेखा करना पड़ता है . वैसे भी सिर्फ किताबी कीड़ा होना पुरानी बात हो गई है आजकल आलराउंडर होना चलन में हैं . ऐसे में समर कैंप के बहाने , बच्चे मस्ती -मस्ती में कुछ नया सीख लेते हैं . 1 5 दिन से लेकर एक महीने तक चलने वाले इन कैंपों में पेंटिंग , डांस ,सेल्फ - डिफेंस , जनरल नॉलेज बढ़ाने से लेकर हैंडराइटिंग सुधारने तक के तरीके सिखाए जाते हैं . आज कल तो स्कूल की ओर से भी ऐसे कैंप लगाए जाते हैं, जिनकी फी बहुत कम होती है .
पर्सनल क्लासेज आजमाएं :
यदि आप बच्चे को समर कैंप में नहीं डालना चाहते तो उसके शौक को ध्यान में रखते हुए किसी डांस, म्यूजिक, पेंटिंग , कराटे क्लास में दाल सकते हैं , इससे उसमे कुछ नया सीखने की ललक तो जागेगी ही साथ अपने हम उम्र के साथ दोस्ती करना भी सीख जाएगा , यकीन मानिए क्लास से लौट कर जब वह अपने प्रैक्टिस की कहानियां सुनाएगा तो आपको भी मजा आएगा .
समय निकाले बनाए प्लान :
यदि पेरेंट्स वर्किंग हो तो बच्चे के लिए समय नहीं निकल पातें हैं . माँ अगर हाउस वाइफ हो तो भी अन्य जिम्मेदारियों को निभाने में बच्चे को अनदेखा कर देती हैं . छुट्टियों में बछो के साथ बात-चीत करें , खेलें यानी उनकी दुनिया का हिस्सा बन जाएं . वीकेंड पर पिकनिक, सैर- सपाटा का प्लान बनायें ताकि बच्चे खुद को ख़ास महसूस करें .
थोड़ा सा ध्यान देने की जरुरत है फिर बच्चे और पेरेंट्स दोनों ही छुट्टियों को पूरा एन्जॉय करेंगे . आपकी लापरवाही से ऐसा न हो कि वेकेशन के बहाने बच्चा दिन रात टीवी , कंप्यूटर , वीडियो गेम से चिपका रहे और वेकेशन के बाद मोटा और भोंदू हो जाए ., ऐसा होने से पहले ही चलिए करें कुछ बढ़िया प्लान ...
-सोनी सिंह -
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)






